छग में गोबर खरीदी: आर्थिक नवाचार या राजनीतिक ‘अवशेष’वाद’…!

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    यकीनन छत्तीसगढ़ सरकार का यह फैसला गोबर को प्रतिष्ठा दिलाने वाला है। वरना ‘पंच गव्य’ का यह पांचवा तत्व आर्थिक रूप से भी उपेक्षित ही रहा है। बावजूद इसके कि गाय बराबर गोबर कर रही हैं। लेकिन किसी सरकार का ध्यान इस बात पर गंभीरता से नहीं गया कि गोबर गोपालक के साथ-साथ सरकार की माली हालत को भी बदल सकता है। यह पहल इसलिए भी अनूठी है, क्योंकि कोरोना काल में मप्र सहित देश की कई राज्य सरकारों ने शराब को ही आर्थिक वैतरणी माना हुआ था। अब इस श्रेणी में गोबर का शुमार होना उत्साहवर्द्धक और नवाचारी है।

    खबर यह है कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने तय किया है कि वह राज्य में पशुपालकों से गाय का गोबर खरीदेगी। कितना और किस भाव खरीदेगी, यह अभी तय होना है, मुख्यमंत्री श्री बघेल का कहना है कि इस गोबर खरीदी से छग की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा, लोग आवारा पशुओं के साथ उनके गोबर पर भी कड़ी निगाह रखेंगे तथा वर्मी कम्पोस्ट खाद भी भरपूर मात्रा में बनेगा। तय हुआ है कि सरकार गोबर खरीद कर खाद बनाएगी। यह खाद किसानों, वन विभाग और उद्यानिकी विभाग को दी जाएगी। राज्य में गोबर खरीदी ‘गोधन न्याय योजना’ के तहत 21 जुलाई को इसकी शुरूआत हरेली त्योहार के दिन से करेगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मीडिया से चर्चा में दावा किया कि गोबर प्रबंधन की दिशा में ठोस प्रयास करने वाली ये देश की पहली सरकार है। योजना सफल रही तो सरकार आगे गोमूत्र भी खरीदेगी। गोबर कैसे, कहां और कितना खरीदा जाए, इसके लिए राज्य में कृषि मंत्री रवींद्र चौबे की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय मंत्रिमंडल उपसमिति भी बनाई गई है। ये समिति गोबर के वित्तीय प्रबंधन पर रिपोर्ट भी तैयार करेगी।

    दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में गोबर कारोबार का ऑनलाइन प्लेटफाॅर्म ‘गोबर-धन’ शुरू करने का ऐलान किया था। साथ ही गोमूत्र स्टार्ट अप्स के लिए फंडिंग की व्यवस्था भी की थी। यह कारोबार कितने का है, इसकी एकजाई जानकारी नहीं है। फिर भी देश में आज गोबर और गोमूत्र की मांग बढ़ रही है, ऐसा माना जा सकता है। वैसे भी हमारे देश में गोबर और वो भी गाय का हो तो उसका विशेष धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक महत्व रहा है। क्योंकि गोबर केवल गाय का अवशिष्ट न होकर बहुउपयोगी वस्तु भी है। मिट्टी के घरों की लिपाई, कंडों के रूप में ईंधन और मप्र के निमाड़-मालवा में श्राद्ध पक्ष में संजा बनाने के काम में भी गोबर का उपयोग होता है। छत्तीसगढ़ में तो गोबर के खूबसूरत दिये भी बनते हैं। ये दिये कुछ महिला स्व-सहायता समूह बना रहे हैं। पहले ये जलते हैं और बाद में खाद में बदल जाते हैं। इन सबका कारण यह है कि गोबर आसानी से उपलब्ध होने वाला बेहद सस्ता पदार्थ है।

    यहां सहज जिज्ञासा हो सकती है कि छत्तीसगढ़ कितना बड़ा गोबर उत्पादक राज्य है? क्या सरकार के पास इसके ठोस आंकड़े हैं? एक गाय रोजाना कितना गोबर करती है, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। अलबत्ता एक वेबसाइट पर जानकारी मिली कि एक गाय रोजाना औसतन लगभग 30 किलो तक गोबर करती है। छग पशुपालन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में करीब 12 लाख गाएं हैं। इसीसे राज्य में गोबर उत्पादन की मात्रा का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस गणना में भैंसों का गोबर शामिल नहीं है। छग में भैंसों की संख्या 14 लाख बताई जाती है। बघेल सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह भैंसो का भी गोबर खरीदेगी या नहीं ? ऐसे में गाय और भैंसों में यह भेदभाव राजनीतिक मुददा भी बन सकता है। क्योंकि भैंसों की गोबर करने की क्षमता यकीनन गायों से ज्यादा है।

    वैसे भाजपा गाय की बजाए भैंसों की गोबर खरीदी को राजनीतिक मुद्दा बनाएगी, इसकी संभावना कम है। क्योंकि उसकी प्राथमिकता गाय ही रही है। हिंदू धर्म में भी गाय को ही देवतुल्य माना गया है न कि भैंस को। गाय के मुकाबले ज्यादा दूध और गोबर देने के बाद भी भैंसों का धार्मिक- राजनीतिक महत्व शून्य हैं। गोबर उत्पादन में पूरा योगदान देने के बाद भी इस स्थि‍ति में कोई बदलाव होगा, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। कारण भैंसों की वोट दोहन क्षमता उनके दिमाग‍ के बराबर ही है।

    छग में गोबर खरीदी: आर्थिक नवाचार या राजनीतिक ‘अवशेष’वाद’…!

    एक बात साफ है कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के एक प्रमुख घटक के रूप में गोबर के ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं। वरना हमारे देश में अत्यंत उपयोगी होने के बाद भी गोबर को अपेक्षित सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा नहीं मिल पाई है। शहरी संस्कृति के लोग तो गोबर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। सिवाय इसके कि बाटी बाफले बनाने के लिए कंडों के रूप में गोबर का उपयोग होता है। अलबत्ता हमारी लोक संस्कृति में गोबर के गणेश बनाने की परंपरा है। इसे मंगलसूचक माना जाता है। लेकिन जब शब्द रूप में ‘गोबर’ और ‘गणेश’ साथ आते हैं तो उसका अर्थ जड़बुद्धि क्यों हो जाता है, यह विचारणीय प्रश्न है। क्योंकि गणेश तो बुद्धि के देवता हैं। यही नहीं हमारे यहां ‘गुड़’ के साथ ‘गोबर’ ( गुड़ गोबर) मिलने पर भाव सत्यानाश मारने का हो जाता है। जबकि ‘गुड़’ और ‘गोबर’ दोनो सनातन परंपरा में धार्मिक कर्मकांड सामग्री का अहम हिस्सा हैं। इसी तरह गाय नैसर्गिक रूप से बारहों महिने गोबर करती हैं, लेकिन बरसात में होने वाले उनके गोबर की वैल्यू भी ‘निल’ है। शायद इसीलिए कहावत बनी कि ‘बरसात का गोबर न लीपने का पोतने का।‘

    जब मध्यप्रदेश में उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थीं तब उन्होंने राज्य में पंच ‘गव्य’ और पंच ‘ज’ को प्राथमिकता दी थी। इस ‘ग’ में एक गोबर भी था और दूसरे ‘ज’ में जानवर अर्थात गाय शामिल थी। यह बात अलग है कि उमा जी के पद से हटते ही ‘ग’ और ‘ज’ आपस में गड्ड-मड्ड होकर सत्ता की राजनीति में तिरोहित हो गए। इसका एक कारण यह भी रहा कि बाद में भी सत्तारूढ़ रही भाजपा ने ‘पंच गव्य’ में भी ज्यादा ध्यान गोमूत्र व गोरस (दूध) पर ही दिया और नै‍सर्गिक रूप से उत्पादित गोबर को ‘गोबर’ की तरह ही ट्रीट किया।

    ऐसे में लगता है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अब इस पांचवे ‘गव्य’ पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। चाहें तो इसे आप अवसरवाद की तर्ज पर ‘राजनीतिक ‘अवशेष’वाद’ भी कह सकते हैं। क्योंकि जिस गोबर को उपयोगी होते हुए भी लोकमानस में नकारात्मक भाव से ही देखा गया, उसे छग सरकार ने नए सिरे से प्रतिष्ठित करने का महती बीड़ा उठाया है। ये राज्य में विपक्षी भाजपा को भी सीधा संदेश है कि बाकी गाय पर भले उसने कब्जा कर लिया हो, लेकिन कांग्रेस वंचित ( वस्तुओं को भी) को न्याय दिलाने वाली पार्टी है।

    बहरहाल सरकार द्वारा गोबर खरीदी का यह प्रयोग सफल रहा तो भविष्य में ‘गोबर गाथा’ भी बदलेगी। हो सकता है कि गोबर की आर्थिक कामयाबी के बाद इसका नाम बदलकर कुछ और करने की मांग उठे। गोबर की सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का आग्रह भी हो सकता है। कहते हैं कि गोबर शब्द का उद्भव संस्कृत के ‘गोर्वर’ से हुआ है। वर्तमान में प्रचलित ‘गोबर’ शब्द में कल्याणकारी भाव भले न हो, लेकिन भोपाली कहावत है कि गोबर अपने साथ कुछ लेके ही उठता है। छत्तीसगढ़ में यह चरितार्थ भी हो सकती है।

    अजय बोकिल
    साभार धमासान.कॉम

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